Tuesday, December 30, 2008
ऐसे ही चले अमन की बहार.....
bullet.... से दूर ballet... से करीब
जम्मू व कश्मीर में का फैसला आ गया है, यहाँ बड़ी बात यह नहीं है कि कौन सी पार्टी सरकार बनाने में कामयाब रही या कौन नाकाम रही..... इस बार यहाँ की पोलिंग परसेंटेज आँखें खोलने वाली रही, खास तौर पर ऐसे हालात में जब की हुर्रियत कांफ्रेंस ने बायकाट का एलान किया था। हुर्रियत का बायकाट के बावजूद बुल्लेट से दूर जाना और कश्मीरी अवाम का बेलेट के करीब आना इस बात की गवाही है की वादी के हालत बदल रहे हैं....
अब उन लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है जिन को अवाम ने बड़ी उम्मीदों के साथ सत्ता की बाग़ डोर सौंपी है की वो किस तरह अवाम की खुअहिशात और उम्मीदों का लिहाज़ रखते हैं। यह तो सभी जानते है की जन्नते अर्जी यानि कश्मीर के सामने problems का एक अम्बार है...
Saturday, December 20, 2008
शायद............!
दिल्ली यूनिवर्सिटी ( नार्थ कैम्पस) की एजूकेशन फैकेल्टी, जो CIE के नाम से मशहूर है.......। ऑफिस से छुट्टी की वजह से एक दिन मै और मेरा क्लोजेस्ट और राजदार दोस्त सज्जाद अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए उसी बेंच पर बेठे हुए थे, जिस पर २००१-०२ मे बी एड के दौरान बेठा करते थे ------ !
CIE के लॉन की ये वही बेंच थी, जिस पर मैं, सज्जाद और हमारे ग्रुप के बाक़ी चार पाँच लोग भी बेठा करते थे, बाक़ी का नाम इस लिए नही ले रहा हूँ, क्यों कि उन में कुछ पराये.... हो... चुके.... हैं ...... ।
खैर, सी आई ई के पूरे कैम्पस में मैं और सज्जाद क्लास के अलावा अगर कहीं मिलते थे तो वो या तो कैंटीन होती थी या फिर यही बेंच, जिस का ज़िक्र मैंने ऊपर किया। इस का ज़िक्र इस लिए बार बार आ रहा है, क्यों कि वहां बैठ कर हम लोगो ने अपनी ज़िन्दगी के सब से हसीं पलों में से कुछ पल गुज़ारे हैं.................
यहीं बेठ कर सर्दियों की मखमली धूप और गर्मिओं की खुशगवार सुबह का लुत्फ़ भी खूब उठाया है, जो आम तौर पर दिल्ली में हासिल नहीं होता --------
एक दूसरे को समझा, जज़्बात को महसूस किया और साथ ही गुलचर्रे भी खूब उडाये। लेकिन आज बहुत कुछ बदला हुआ था, यहा के दरो दीवार सब कुछ पराये से लग रहे थे............, सिवाए सज्जाद और बीती हुई कुछ यादों के ....................................!
लेकिन आज मुझे सज्जाद ने शायद किसी ख़ास मकसद से यहाँ बुलाया था, मुझे इस जगह को भुलाये हुए एक ज़माना हो चुका था, लेकिन सज्जाद बी एड , एम् एड और एम् फिल के बाद भी इस जगह को नहीं भूल पा रहा था, शायद आज ख़ास तौर पर मुझे यहाँ बुलाने की वजह भी यही थी।
कुछ पुरानी, कुछ नयी बातों का सिलसिला शुरू हुआ.... अचानक उस के मुंह से निकला यार, क्या दोस्ती का मतलब बदल गया है ......... ? उस के इस सवाल में दुःख था, दर्द था.... मायूसी थी---- बेचारगी थी---- और अफ्सुर्दगी थी........
वो मुझ से पूछना चाह रहा रहा था की क्या वाकई दुनिया बदल गई है........? क्या रिश्तों का कोई मानी नहीं रह गया है ? क्या सिर्फ़ वक्त, हालात और ज़रूरत के मुताबिक रिश्ते बनते और बिगड़ते हैं.....?
मैं कुछ बोलूँ , इस से पहले ही वो मुझ से सवाल पर सवाल दागे जा रहा था..... जब उस के सवालात का सिलसिला टूटा, तो मैने कुछ बोलने की कोशिश की, लेकिन sajjad के सवालात की फहरिस्त इतनी लम्बी हो चुकी थी, के मुझे जवाब देने से पहले सोचना पड़ रहा था, मुझ से कोई जवाब देते नहीं बन रहा था।.........................!
मैने उससे पूछा आख़िर वजह क्या है? क्यों इस कदर खफा है...................?
मैं सोचने लगा के कहीं मुझ से तो कुछ उल्टा पुल्टा नहीं हो गया, लेकिन फिर मैने सोचा की अगर मुझ से कुछ होता तो वो मुझ से सीधे बता देता और फिर हम दोनों की तो बे मकसद दोस्ती है, यानी हमारे बीच सिर्फ़ और सिर्फ़ दोस्ती है। और न ही हमारी दोस्ती के बीच कोई तीसरा है।
खैर..... मैने उस से कहा के अब सीधे सीधे बता दे, कि असल बात क्या है? उस ने जब अपनी कहानी बताई तो दोस्ती को लेकर उस से ज्यादा सवाल मेरे दिमाग में घूमने लगे..............
फुर्सत का वक्त था और फिर मेरा फ़र्ज़ भी था की उस के दिल को कुछ हल्का करू। मैने कहा मुझे साफ़ मुझे बता दे। हो सकता है मैं तेरी कुछ मदद कर सकूं। मैने इतनी बेबाकी से इस लिए कहा, क्यों की हम लोगों के दरम्यान कोई राज़, राज़ नहीं रहता, एक सच्चे दोस्त के नाते सब कुछ एक दूसरे के साथ श्येर करते हैं, यहाँ तक के कुछ घरेलू मामलात भी एक दूसरे से शेयर कर लेते हैं, लिहाजा उस ने अपनी कहानी बतानी शुरू की ................
'' जब एलिना ने CIE में क़दम रखा तो उसकी मासूमियत , उसकी भोली भली सूरत, उसका शर्माना, किसी से भी कम बात करना और उसका पुरकशिश चेहरा ही मेरी तवज्जोह का सबब बना । उससे बात करने के लिए ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा, क्यों की मेरी सादगी, सच्चाई और डिपार्टमेन्ट में मेरी इमेज ने कहीं न कहीं उसे भी मेरी तरफ़ अट्रेक्ट किया था। जब उससे बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो ऐसा महसूस हुआ कि तेरे जाने के बाद एक सच्चे और अच्छे दोस्त की जो कमी पैदा हुई थी, वो कुछ हद तक दूर हो जायेगी ............. !
ऑफिस की बातें होतीं.............., कुछ पुरानी कुछ नई बातें होतीं----------,
लेकिन पर्सनल बातें अभी बहुत कम ही हुई थीं। न तो मैने कभी जानने की कोशिश की और न ही मेरे अतीत के बारे में उसने कभी बहुत गहराई से जानना चाहा...... हम लोग जानना भी नहीं चाहते थे, क्यों की हमें अपने रास्ते और अपनी मंजिल के बारे में बखूबी मालूम था। फिर भी न जाने क्यों ऐसा महसूस होने लगा, जैसे मेरी और उसकी मुलाक़ात बहुत पुरानी है और इस मुलाक़ात की आगे की मुद्दत भी काफ़ी है , शायद उसे भी ऐसा ही महसूस हुआ.................। इसी एहसास ने हमे एक दूसरे के करीब ला दिया। शायद वो मेरे मिजाज, मेरे नेचर और मेरी आदत को समझ गयी थी,यानि मेरे ज़ाहिर और बातिन में कोई फर्क नहीं --------------
मुझे भी लगा कि उसे सही और ग़लत का फर्क समझ में आता है, इसी दौरान उसने मुझे ये भी एहसास कराया कि वो बीसवीं सदी की उन लड़कियों की तरह नहीं है, जिन का मकसद....................!
मेरे ज़हन में लड़कियों की जो तस्वीर थी, एलीना ने उस इमेज को काफ़ी हद तक दूर कर दिया था। मुझे इस बात का कोई गुमान न था कि में एम् एड में हूँ और वो बी एड में, यानी वो मुझ से जूनियर है। हमारी बातचीत को लगभग दो महीने गुज़र चुके थे, लेकिन एक दूसरे के फोन नम्बर हमारे पास नहीं थे...........,
मैंने अपनी आदत के मुताबिक फोन नम्बर लेने में पहल नहीं की, एक दिन एलीना ने मुझ से कहा कि अगर तुम्हारे पास मोबाइल.......... हो तो नम्बर दे दो.............,
खैर मैने उस को अपना नम्बर दे दिया, उसी रोज़ शाम को मेरे पास एक मेसेज आया, जिसमे वाकई कोई '' मेसेज'' था ........ उसका नम्बर मेरे पास नहीं था, लेकिन मेसेज से समझ में आ रहा था कि ये किसी ''अपने'' का ही मेसेज है, मैने बिना देर किए एक माकूल सा जवाब दे दिया ........ ॥
ये उस सिलसिले की पहली कड़ी थी, जो अगले कई महीनो तक बिना किसी रुकावट के जारी रहा। सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि डिपार्टमेन्ट में रोज़ मुलाक़ात के बावजूद रात को गुडनाईट मेसेज किए बगेर सोने का तसव्वुर ही ख़त्म हो गया.................
हमारी कुर्बत के ऐसे सिलसिले बनते गए, जैसे इस रिश्ते और इन सिलसिलों को हमारी मुलाक़ात का बहुत पहले से इंतज़ार था......एक ही प्रोफशनल कोर्स, एक ही लोकेलिटी में रहना, और फिर साथ ही आना जाना हमारी दोस्ती का खूबसूरत सबब बन गया। '' डी यू स्पेशल'' में हमारी सीट तकरीबन फिक्स हो गई थी........
हमारी कुर्बतों और मुलाकातों का यह सिलसिला बदस्तूर जारी था ........ खुदा जाने हमारी दोस्ती को जो सिर्फ़ दोस्ती ही थी, किसी की नज़र लग गई .......................
सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, एक दिन अचानक एलीना की ज़बान से वो लफ्ज़ निकले, जिन की मैने कभी उम्मीद नहीं की थी--------------- मैं सोच कर परेशान था, हैरान था............
एलीना ने यकायक मुझ से कहा की अब मैं तुम से न बात कर सकती हूँ , न कोई रिश्ता रख सकती हूँ........
अब हमारे रास्ते अलग अलग हैं, मैंने एलिना को रोक कर कुछ पूछना चाहा......
लेकिन वो तो जैसे सिर्फ़ बोलने ही आयी थी, कुछ सुनने नही।
मेरी कैफियत अजीबो गरीब हो गयी -------- मेरे पैरों के नीचे ज़मीन धास्ती हुई महसूस हुई .................... मैं सोच नहीं पा रहा था के आख़िर इसे हुआ क्या है .........?
मैं एलीना को देखता जा रहा था और वो बिना किसी ब्रेक के बोले जा रही थी............... कुछ लम्हों के बाद जब वो रुकी तो मैने ख़ुद को संभाला .............
मैने पूछा के मुझे केवल मेरा गुनाह बता दो .........
लेकिन उस के पास ऐसा कोई माकूल जवाब नही था....................!
मुझे अब अपनी उस गलती का एहसास हो रहा था जब मैने एलीना से मुलाक़ात के बाद अपनी उस सोच को बदल लिया था के सभी लड़कियां एक जैसी नहीं होती ...............
या सभी बीसवीं सदी में नहीं जी रहीं हैं ..............---------------''
सज्जाद की ये अफ्सुर्दगी भरी कहानी सुन कर मेरे पास उस के उन सवालात का कोई कोई मुनासिब जवाब नहीं था जो उस ने मुझे अपनी रूदाद सुनाने से पहले पूछे थे.........
मैं केवल इतना ही कह सका -----
हाँ......... दोस्ती के मानी--------- बदल गए हैं............................. शायद
Monday, December 15, 2008
hello mr. bush.........?
bush par joote kyon pare...?
abhi kuch roz pahle hi bush ne kaha tha ki unhon ne iraq me jo kya us ke baare me ghalat information thi . lekin kya bush ke itna bhar kah dene se hi lakhon maasoom aur begunah iraqyon ke lahoo se alooda bush aur us ke hawaaryon ke haath saaf ho jayenge. shayad kabhi nahi.... aur shayad iraqiyon ki kayee pushten bhi in logon ko maaf nahin karengi... is ki taaza misaal apne aakhree iraq daure ke dauraan ek sahaafi ke zarye un ke upar jooton ki bauchchar se dekhne ko mil jaati hai..... bush ko sochna chaahye ke aakhir ye naubat kyaon aayee..... ?
.................
बुश ऐसी ही विदाई के हक़दार थे ......?
सुपर पॉवर देश के ''super men'' के साथ के अपने अन्तिम दौरे पर ऐसा व्यवहार होगा ये कम से कम ख़ुद बुश ने तो नही सोचा होगा। यधपि उनहोंने जो कृत्य किए हैं उन के लए तो उन्हें जो भी सज़ा मिले वो कम ही रहेगी। लेकिन बुश की बेशर्मी और बेहयाई देखए के उनहोंने अपने ऊपर जूते मारे जाने की इस घटना को मजाक में उडाने का प्रयास किया, ठीक उसी प्रकार जेसे वो लाखों मासूम और बेगुनाह इराक्यों के खून से लथपथ अपने हाथों को देख कर खुश होते हैं......
Monday, December 8, 2008
Sunday, December 7, 2008
Tanha Musafir

Tera hum safar kahan hai....?
ye chiragh be'nazar hai ye sitara be'zubaan hai
abhi tujh sey milta julta koi doosra kahan hai
wohi shakhs jis pey apney dil'o'jaan nisaar kar dun
wo agar khafa nahi hai to zaroor badgumaan hai
kabhi paa ke tujh ko khona, kabhi kho ke tujh ko pana
ye janam janam ka rishta tere mere darmiyaan hai
mere saath chalney waley tujhey kya mila safar me
wohi dukh bhari zameen hai wohi gham ka aasman hai
mein isi gumaan mein barson bara mutmai'en raha hun
tera jism be'taghayyur hai mera pyaar jawedaan hai
unhi raston ne jin per kabhi tum they saath mere
mujhe rok rok poocha tera humsafar kahan hai?
.....................
Saturday, December 6, 2008

Yahi hota hai to aakhir yahi hota kyun hai ?
Us k seene me sama jaye hamari dharkan
Itni qurbat hai to phir fasla itna kyun hai ?
Ek lute ghar pe dya karta hai dastak koi
Aas jo toot gayi phir se bandhata kyun hai ?
Kahte hain pyar ka rishta hai janam ka rishta
Hai janam ka jo yeh rishta to badalta kyun hai ?
हम एक हों .....!.

आज जब मैने अपना ब्लॉग बनाने के बारे में सोचा, तो मेरे ज़हन में सिर्फ़ एक बात गर्दिश कर रही थी की किस प्रकार अपनी भावनाओं को अपने दोस्त, अहबाब और मित्रों के साथ बाटूँ। बाँटने के लिए तो बहुत कुछ होता है इंसान के पास, घर से लेकर दफ्तर तक और दफ्तर से लेकर समाज तक चारों ओर सोचने और बाँटने के लिए हमेशा ही कुछ न कुछ होता है और है भी, लेकिन इत्तेफाक से आज ६ दिसम्बर का वो काला दिन भी है, जिस दिन देश के कुछ तथाकथित देश भक्तों ने पूरे संसार में भारत को कलंकित कर दिया था। खैर ...... आज देश जिन हालात से गुज़र रहा है, वो हमें केवल एक ही आवाज़ लगा रहे हैं कि हम सब एकजुट हो जाये एक दूसरे के दुःख दर्द में शरीक हो जायें। एक दूसरे पर तोहमत लगाने के बजाये सच्चाई को सामने लाने का प्रयास करें। अगर भारत के दुश्मन देश के बाहर हैं, तो देश के अन्दर भी ऐसे दुश्मनों की कोई कमी नही है। बस आवश्यकता इस बात की है कि हम ईमानदारी से इन दुश्मनों की पहचान करें और दुनिया के सामने इन्हें बेनकाब कर दे, लेकिन इस के लए हमें बिना किसी भेदभाव के मिलजुल कर और एक जागरूक शहरी की तरह काम करना होगा।
YameeN
6-12-08
