Saturday, December 20, 2008

शायद............!

दिल्ली यूनिवर्सिटी ( नार्थ कैम्पस) की एजूकेशन फैकेल्टी, जो CIE के नाम से मशहूर है.......
ऑफिस से छुट्टी की वजह से एक दिन मै और मेरा क्लोजेस्ट और राजदार दोस्त सज्जाद अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए उसी बेंच पर बेठे हुए थे, जिस पर २००१-०२ मे बी एड के दौरान बेठा करते थे ------ !
CIE के लॉन की ये वही बेंच थी, जिस पर मैं, सज्जाद और हमारे ग्रुप के बाक़ी चार पाँच लोग भी बेठा करते थे, बाक़ी का नाम इस लिए नही ले रहा हूँ, क्यों कि उन में कुछ पराये.... हो... चुके.... हैं ...... ।
खैर, सी आई ई के पूरे कैम्पस में मैं और सज्जाद क्लास के अलावा अगर कहीं मिलते थे तो वो या तो कैंटीन होती थी या फिर यही बेंच, जिस का ज़िक्र मैंने ऊपर किया। इस का ज़िक्र इस लिए बार बार आ रहा है, क्यों कि वहां बैठ कर हम लोगो ने अपनी ज़िन्दगी के सब से हसीं पलों में से कुछ पल गुज़ारे हैं.................
यहीं बेठ कर सर्दियों की मखमली धूप और गर्मिओं की खुशगवार सुबह का लुत्फ़ भी खूब उठाया है, जो आम तौर पर दिल्ली में हासिल नहीं होता --------
एक दूसरे को समझा, जज़्बात को महसूस किया और साथ ही गुलचर्रे भी खूब उडाये। लेकिन आज बहुत कुछ बदला हुआ था, यहा के दरो दीवार सब कुछ पराये से लग रहे थे............, सिवाए सज्जाद और बीती हुई कुछ यादों के ....................................!
लेकिन आज मुझे सज्जाद ने शायद किसी ख़ास मकसद से यहाँ बुलाया था, मुझे इस जगह को भुलाये हुए एक ज़माना हो चुका था, लेकिन सज्जाद बी एड , एम् एड और एम् फिल के बाद भी इस जगह को नहीं भूल पा रहा था, शायद आज ख़ास तौर पर मुझे यहाँ बुलाने की वजह भी यही थी।
कुछ पुरानी, कुछ नयी बातों का सिलसिला शुरू हुआ.... अचानक उस के मुंह से निकला यार, क्या दोस्ती का मतलब बदल गया है ......... ? उस के इस सवाल में दुःख था, दर्द था.... मायूसी थी---- बेचारगी थी---- और अफ्सुर्दगी थी........
वो मुझ से पूछना चाह रहा रहा था की क्या वाकई दुनिया बदल गई है........? क्या रिश्तों का कोई मानी नहीं रह गया है ? क्या सिर्फ़ वक्त, हालात और ज़रूरत के मुताबिक रिश्ते बनते और बिगड़ते हैं.....?
मैं कुछ बोलूँ , इस से पहले ही वो मुझ से सवाल पर सवाल दागे जा रहा था..... जब उस के सवालात का सिलसिला टूटा, तो मैने कुछ बोलने की कोशिश की, लेकिन sajjad के सवालात की फहरिस्त इतनी लम्बी हो चुकी थी, के मुझे जवाब देने से पहले सोचना पड़ रहा था, मुझ से कोई जवाब देते नहीं बन रहा था।.........................!
मैने उससे पूछा आख़िर वजह क्या है? क्यों इस कदर खफा है...................?
मैं सोचने लगा के कहीं मुझ से तो कुछ उल्टा पुल्टा नहीं हो गया, लेकिन फिर मैने सोचा की अगर मुझ से कुछ होता तो वो मुझ से सीधे बता देता और फिर हम दोनों की तो बे मकसद दोस्ती है, यानी हमारे बीच सिर्फ़ और सिर्फ़ दोस्ती है। और न ही हमारी दोस्ती के बीच कोई तीसरा है।
खैर..... मैने उस से कहा के अब सीधे सीधे बता दे, कि असल बात क्या है? उस ने जब अपनी कहानी बताई तो दोस्ती को लेकर उस से ज्यादा सवाल मेरे दिमाग में घूमने लगे..............
फुर्सत का वक्त था और फिर मेरा फ़र्ज़ भी था की उस के दिल को कुछ हल्का करू। मैने कहा मुझे साफ़ मुझे बता दे। हो सकता है मैं तेरी कुछ मदद कर सकूं। मैने इतनी बेबाकी से इस लिए कहा, क्यों की हम लोगों के दरम्यान कोई राज़, राज़ नहीं रहता, एक सच्चे दोस्त के नाते सब कुछ एक दूसरे के साथ श्येर करते हैं, यहाँ तक के कुछ घरेलू मामलात भी एक दूसरे से शेयर कर लेते हैं, लिहाजा उस ने अपनी कहानी बतानी शुरू की ................

'' जब एलिना ने CIE में क़दम रखा तो उसकी मासूमियत , उसकी भोली भली सूरत, उसका शर्माना, किसी से भी कम बात करना और उसका पुरकशिश चेहरा ही मेरी तवज्जोह का सबब बना । उससे बात करने के लिए ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा, क्यों की मेरी सादगी, सच्चाई और डिपार्टमेन्ट में मेरी इमेज ने कहीं न कहीं उसे भी मेरी तरफ़ अट्रेक्ट किया था। जब उससे बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो ऐसा महसूस हुआ कि तेरे जाने के बाद एक सच्चे और अच्छे दोस्त की जो कमी पैदा हुई थी, वो कुछ हद तक दूर हो जायेगी ............. !
ऑफिस की बातें होतीं.............., कुछ पुरानी कुछ नई बातें होतीं----------,
लेकिन पर्सनल बातें अभी बहुत कम ही हुई थीं। न तो मैने कभी जानने की कोशिश की और न ही मेरे अतीत के बारे में उसने कभी बहुत गहराई से जानना चाहा...... हम लोग जानना भी नहीं चाहते थे, क्यों की हमें अपने रास्ते और अपनी मंजिल के बारे में बखूबी मालूम था। फिर भी न जाने क्यों ऐसा महसूस होने लगा, जैसे मेरी और उसकी मुलाक़ात बहुत पुरानी है और इस मुलाक़ात की आगे की मुद्दत भी काफ़ी है , शायद उसे भी ऐसा ही महसूस हुआ.................। इसी एहसास ने हमे एक दूसरे के करीब ला दिया। शायद वो मेरे मिजाज, मेरे नेचर और मेरी आदत को समझ गयी थी,यानि मेरे ज़ाहिर और बातिन में कोई फर्क नहीं --------------
मुझे भी लगा कि उसे सही और ग़लत का फर्क समझ में आता है, इसी दौरान उसने मुझे ये भी एहसास कराया कि वो बीसवीं सदी की उन लड़कियों की तरह नहीं है, जिन का मकसद....................!
मेरे ज़हन में लड़कियों की जो तस्वीर थी, एलीना ने उस इमेज को काफ़ी हद तक दूर कर दिया था। मुझे इस बात का कोई गुमान न था कि में एम् एड में हूँ और वो बी एड में, यानी वो मुझ से जूनियर है। हमारी बातचीत को लगभग दो महीने गुज़र चुके थे, लेकिन एक दूसरे के फोन नम्बर हमारे पास नहीं थे...........,
मैंने अपनी आदत के मुताबिक फोन नम्बर लेने में पहल नहीं की, एक दिन एलीना ने मुझ से कहा कि अगर तुम्हारे पास मोबाइल.......... हो तो नम्बर दे दो.............,
खैर मैने उस को अपना नम्बर दे दिया, उसी रोज़ शाम को मेरे पास एक मेसेज आया, जिसमे वाकई कोई '' मेसेज'' था ........ उसका नम्बर मेरे पास नहीं था, लेकिन मेसेज से समझ में आ रहा था कि ये किसी ''अपने'' का ही मेसेज है, मैने बिना देर किए एक माकूल सा जवाब दे दिया ........ ॥
ये उस सिलसिले की पहली कड़ी थी, जो अगले कई महीनो तक बिना किसी रुकावट के जारी रहा। सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि डिपार्टमेन्ट में रोज़ मुलाक़ात के बावजूद रात को गुडनाईट मेसेज किए बगेर सोने का तसव्वुर ही ख़त्म हो गया.................
हमारी कुर्बत के ऐसे सिलसिले बनते गए, जैसे इस रिश्ते और इन सिलसिलों को हमारी मुलाक़ात का बहुत पहले से इंतज़ार था......एक ही प्रोफशनल कोर्स, एक ही लोकेलिटी में रहना, और फिर साथ ही आना जाना हमारी दोस्ती का खूबसूरत सबब बन गया। '' डी यू स्पेशल'' में हमारी सीट तकरीबन फिक्स हो गई थी........
हमारी कुर्बतों और मुलाकातों का यह सिलसिला बदस्तूर जारी था ........ खुदा जाने हमारी दोस्ती को जो सिर्फ़ दोस्ती ही थी, किसी की नज़र लग गई .......................
सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, एक दिन अचानक एलीना की ज़बान से वो लफ्ज़ निकले, जिन की मैने कभी उम्मीद नहीं की थी--------------- मैं सोच कर परेशान था, हैरान था............
एलीना ने यकायक मुझ से कहा की अब मैं तुम से न बात कर सकती हूँ , न कोई रिश्ता रख सकती हूँ........
अब हमारे रास्ते अलग अलग हैं, मैंने एलिना को रोक कर कुछ पूछना चाहा......
लेकिन वो तो जैसे सिर्फ़ बोलने ही आयी थी, कुछ सुनने नही।
मेरी कैफियत अजीबो गरीब हो गयी -------- मेरे पैरों के नीचे ज़मीन धास्ती हुई महसूस हुई .................... मैं सोच नहीं पा रहा था के आख़िर इसे हुआ क्या है .........?
मैं एलीना को देखता जा रहा था और वो बिना किसी ब्रेक के बोले जा रही थी............... कुछ लम्हों के बाद जब वो रुकी तो मैने ख़ुद को संभाला .............
मैने पूछा के मुझे केवल मेरा गुनाह बता दो .........
लेकिन उस के पास ऐसा कोई माकूल जवाब नही था....................!
मुझे अब अपनी उस गलती का एहसास हो रहा था जब मैने एलीना से मुलाक़ात के बाद अपनी उस सोच को बदल लिया था के सभी लड़कियां एक जैसी नहीं होती ...............
या सभी बीसवीं सदी में नहीं जी रहीं हैं ..............---------------''
सज्जाद की ये अफ्सुर्दगी भरी कहानी सुन कर मेरे पास उस के उन सवालात का कोई कोई मुनासिब जवाब नहीं था जो उस ने मुझे अपनी रूदाद सुनाने से पहले पूछे थे.........
मैं केवल इतना ही कह सका -----
हाँ......... दोस्ती के मानी--------- बदल गए हैं............................. शायद






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