Saturday, September 4, 2010

दुआ करें ११ सितम्बर और १७ सितम्बर के लिए

त्योहारों का मौसम है ,,, कुछ लोग खुशियाँ मन रहे हैं तो कुछ लोग मनाने की तय्यारी कर रहे हैं .... देश में हर तरफ हर्ष और उल्लास का माहौल है ... दुआ भी यही है कि यह माहौल अभी नहीं हमेशा बना रहे ..... मगर आने वाले दिनों में दो ऐसी तारीखें आ रही हैं जिन में से एक ने अगर भारत के समाजी और सियासी ढांचे की न केवल दशा और दिशा बदल दी , बल्कि देश की अस्मिता और देश के संविधान की धज्जियाँ उड़ते देख कर कुछ देर के लिए अमन पसंद लोगों का विश्वास भी डगमगा दिया ........ यानि बाबरी मस्जिद की शहादत का एक ऐसा धब्बा देश के दामन पर लगा कि आज तक उसके निशान बाक़ी हैं और आगे भी रहेंगे ........

दूसरी घटना ने तो पूरे विश्व के परिद्रश्य को बदल डाला ...... यानि ११ सितम्बर २००१ को अमरीका पर जो संदिघ्द हमला हुआ उस के बाद दुनिया ने उसके नाम पर जो देखा वह सबके सामने है .........

अब एक बार फिर इन घटनाओं को याद किया जा रहा है ....... याद भी ऐसे कि आम और अमन पसंद लोगको जैसे किसी आने वाले तूफ़ान का एहसास हो रहा हो ....... हो भी क्यूँ न ,,,,, एक ओर जहाँ ९/११ की बरसी मनाने के लिए अमरीका के एक पादरी ने इसे '' कुरान बर्निंग डे '' के तौर पर मनाने की घोषणा जो कर रखी है ........ एक आम आदमी भी इस के बाद होने वाली वैश्विक प्रितिक्रिया को समझ सकता है , तो ज़ाहिर है कि उस पादरी को भी इस बात का बखूबी एहसास होगा ....... आखिर ऐसे नफरत के सौदागर लोग चाहते क्या हैं ..... क्या वो मुक़द्दस कुरान की प्रीतियां जला कर दुनिया भर के अरबों मुसलमानों के सब्र का इम्तिहान लेना चाहता है या फिर वो क्रिया और प्रितिक्रिया के अमल को हवा देना चाहता है.....

अब बात देश में होने वाले अदालत के एक ऐसे फैसले की जो एक बार फिर भारत भर में उथल पुथल मचा सकता है .... यह फैसला आने वाली १७ सितम्बर को होना है .... बाबरी मस्जिद के सम्बन्ध में होना है यह फैसला , लेकिन अफ़सोस कि कुछ तथाकथित देश भक्तो हर धर्म के ठेकेदारों ने उस से पहले है अपना फैसला सुना दिया है । कुछ हिन्दू संगठनों ने साफ़ कर दिया है के अगर फैसला उन के हक में आया तो मानेंगे वरना नहीं .... अब इसे क्या कहेंगे .... जबकि मुस्लिम संगठन पहले सी ही कहते आये हैं और आज भी कह रहे हैं कि न्यायालय जो भी निर्णय देगी , वो हमें मंज़ूर है ,,, अब आप खुद ही फैसला करें अमन कौन चाहता है और दंगे फसाद कौन पसंद करता है ...

हर अपन पसंद भारतवासी की ज़िम्मेदारी है कि वो नफरत के इन सौदागरों के नापाक मंसूबे पूरे न होने दें .....

साथ ही हम मिलकर दुआ करें कि भारत और दुनिया भर में हमेशा अमन कायम रहे ....... फिर चाहे वो ११ सितम्बर को अमरीका पर हमले की बरसी हो या १७ सितम्बर को बाबरी मस्जिद के सम्बन्ध में आने वाला अदालत का बहुप्रतीक्षित निर्णय .............. आमीन


यामीन अंसारी


Saturday, August 7, 2010

कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा, और कश्मीरी ...?

कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा, और कश्मीरी ...?

हमारे नेता , हमारे बुद्दिजीवी , हमारा मीडिया , हमारा इतिहास सभी इस बात पर एक राय हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है ,,,, बेशक कश्मीर भारत का ही एक राज्य है,,,,,,,, लेकिन जिस शिद्दत से कश्मीर को अपना हिस्सा बताया जाता है..... क्या कभी किसी सरकारी नुमायेंदे या आलोचकों कि ज़बान से यह कहते हुए सुना है कि जिस प्रकार कश्मीर हमारे देश का एक हिस्सा या खित्ता है.... उसी प्रकार कश्मीरी अवाम भी इसी देश के वासी हैं...? शायद नहीं .... यह सही है कि चंद कश्मीरी नौजवान हमारे एक पडोसी ( पाकिस्तान ) के बहकावे में आकर रास्ते से भटक गए .... और उन्होंने जन्नत निशान कश्मीर और कश्मीरियत का बहुत नुकसान क्या... लेकिन फिर भी क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता कि घर के बहके हुए किसी सदस्य को अपनाने के लिए या रास्ते पर लाने के लिए हर संभव कोशिश करें .....
आज कश्मीर के बच्चे अब पत्थर फेंक रहे हैं, खवातीन उनका हौसला बढ़ा रही हैं ... इनके ग़ुस्से की ज़बान पत्थर बन चुकी है। हमारी फ़ौज है कि उसे केवल गोली कि ज़बान ही आती है
बच्चों के हाथ में पत्थर हैं... औरतों के हाथ में पत्थर हैं ... क्या बड़े क्या छोटे, ग़रज़ हर किसी के हाथ में सिर्फ पत्थर है ... गोली या बंदूक नहीं ....
आखिर हम इन पत्थरों को अल्फाज कैसे बना सकते हैं? क्या दुनिया देखे कि दुनिया में एक खित्ता ऐसा भी है, जहां लोग बोलते हैं तो पत्थर बरसते हैं, जहां का लेखक अली मोहम्मद लोन कलम से नहीं, पत्थरों से ड्रामे लिखने लगेगा? जो सोचते हैं कि बन्दूक पत्थरों को झुका लेगी, वे गलत सोचते हैं, क्योंकि पत्थर टूट जाते हैं, झुकते नहीं।
हाल ही में जब कश्मीर के मुख्तलिफ हिस्सों में बेकसूर लोग खास तौर पर नौजवान मारे गये तो एक बिल्कुल ही नए तरीके का एहतेजाज और मुज़ाहिरे सामने आये हैं । कश्मीरी अवाम (बच्चे, औरतें, बूढ़े, जवान) ने अपनी नाराज़गी ईंट-पत्थरों से व्यक्त करनी शुरू कर दी। इंसान जब वाकई मजबूर, मायूस , मजलूम और असहाय हो जाता है, फिर वह पत्थर ही उठाता है और जब बात इससे आगे बढ़ती है तो फिर गोली और बंदूक कि बात होती है .... खुदा करे कश्मीर में फिर वो दिन न आयें .....
अगर खुदा नाख्वास्ता जन्नत निशान कश्मीर कि हसीं वादयों में अमन के नारों कि जगह एक बार फिर गोलीओं कि आवाजें गूंजने लगीं तो फिर इस का जवाबदेह कौन होगा ............ इसके लिए हमारे नुमाइंदों को तैयार रहना चाहए .....


यामीन अंसारी
९०१५७५६९८८


एशियन गेम्स की मेजबानी भी गयी हाथ से ..!


Saturday, July 17, 2010

मुलायम सिंह की माफ़ी काबिले कुबूल , लेकिन ........


मुलायम सिंह की माफ़ी काबिले कुबूल , लेकिन ........
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह ने पहले अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी ... आज़म खान या कुछ लोगों के समझाने पर भी उनकी समझ में नहीं आया ... उत्तर प्रदेश के वोटरों ने भी समझा दिया ... मगर अब आकर शायद उनकी समझ में आया है ... क़ि उनहोंने कल्याण सिंह जैसे नफरत के सौदागर से दोस्ती करके कितनी बड़ी भूल की थी ... खैर सुबह का भूला शाम को घर लौट के आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते ..... लेकिन अब देखना यह होगा क़ि मुलायम सिंह अपने भूले बिछड़े वोटर यानि मुसलमानों को एक बार फिर समाजवादी पार्टी से जोड़ पते हैं या नहीं .... अगर प्रदेश के मुसलमान फिर समाजवादी से जुड़ जाते हैं तो ही मुलायम सिंह का माफ़ी नामा कुबूल समझा जायेगा ....
मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों के नाम जारी अपने बयान में क्या कहा है यह भी देख लें -
"मेरा जीवन साम्प्रदायिक शक्तियों के विरद्ध संघर्ष करने की खुली किताब रहा है। मैंने सदैव साम्प्रदायिक ताकतों को नाकाम करने में पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाया है। सन 1990 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुये अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करते हुए मैने बाबरी मस्जिद को बचाने का काम किया। अपने बयान में मुलायम ने छह दिसम्बर 1992 को उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार रहते हुये बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामलें में मस्जिद गिराने के जिम्मेदार तत्कालीन मुख्यमंत्री को एक दिन के कारावास की सजा भी दी। उन्होंने कहा कि 2009 लोक सभा चुनाव में साम्प्रदायिक शक्तियों की सरकार को केन्द्र में सत्तारूढ होने से रोकने में उन्हें कुछ गलत तत्वों को साथ लेना पडा जिससे भ्रमित होकर सभी धर्मनिरपेक्ष विशेषकर मुसलमान भाईयों को मानसिक कष्ट हुआ और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची। उन्होंने कहा मैं इसे अपनी गलती स्वीकार करता हूं और इसलिए मस्जिद गिराने के जिम्मेदार लोगों को भविष्य में कभी साथ ना लेने की सार्वजनिक घोषणा भी कर चुका हूं। मैं इस घटना के लिए देश के सभी विशेषकर अपने मुसलमान भाइयों से माफी मांगता हूं और उन्हें आश्वस्त करना चाहता हूं कि भविष्य में उनके हितों को सर्वोपरि मानते हुए उनके सम्मान की रक्षा के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करता रहूंगा।"
बार बार मुसलमानो से माफी मांग चुके मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर से मुसलमानो से किस इरादे से माफी मांगी है यह तो साफ तौर पर समझ नही आ रहा है लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि कांग्रेस की ओर जा रहे मुसलमान मतदाताओ को रोकने के लिये मुलायम ने जो माफी मांगी है अब वो कितनी कारगर होती है यह देखने वाली बात होगी।
मुलायम ने लिखा है कि "मेरा जीवन साम्प्रदायिक शक्तियों के विरद्ध संघर्ष करने की खुली किताब रहा है। मैंने सदैव साम्प्रदायिक ताकतों को नाकाम करने में पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाया है। वर्ष 1990 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुये अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करते हुए मैने बाबरी मस्जिद को बचाने का काम किया।" अपने बयान में श्री यादव ने छह दिसम्बर 1992 को उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार रहते हुये बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामलें में मस्जिद गिराने के जिम्मेदार तत्कालीन मुख्यमंत्री को दोषी मानते हुये अदालत उठने तक की सजा भी दी। उन्होंने कहा कि गत लोक सभा चुनाव में साम्प्रदायिक शक्तियों की सरकार को केन्द्र में सत्तारूढ होने से रोकने में उन्हें कुछ गलत तत्वों को साथ लेना पडा जिससे भ्रमित होकर सभी धर्मनिरपेक्ष विशेषकर मुसलमान भाईयों को मानसिक कष्ट हुआ और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची। उन्होंने कहा मैं इसे अपनी गलती स्वीकार करता हूं और इसलिए मस्जिद गिराने के जिम्मेदार लोगों को भविष्य में कभी साथ ना लेने की सार्वजनिक घोषणा भी कर चुका हूं।मैं इस घटना के लिए देश के सभी विशेषकर अपने मुसलमान भाइयों से माफी मांगता हूं और उन्हें आश्वस्त करना चाहता हूं कि भविष्य में उनके हितों को सर्वोपरि मानते हुए उनके सम्मान की रक्षा के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करता रहूंगा।''

समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह के लिए शुभ कामनाएं

यामीन
०९०१५७५६९८८

Tuesday, May 25, 2010

भारत सरकार माफ़ी क्यों नहीं मांगती ...?



लगभग दो ढाई साल पहले जब ऑस्ट्रेलिया में केवल आतंकवादी गतिविधि में शामिल होने के शक की बुनियाद पर बंगलौर के डाक्टर मुहम्मद हनीफ को गिरफ्तार किया गया था .... और उन्हें लगभग एक महीने तक जेल में रखा ,,,, परन्तु जब वह बे गुनाह साबित हो गए तो ऑस्ट्रेलिया की सरकार को अपनी ग़लती का एहसास हो गया तो सरकार ने अपने किये के लिए माफ़ी मांग ली थी .... यही नहीं उन्हें अपने यहां आकर काम करने का न्योता भी दिया। निश्चय ही ऑस्ट्रेलिया में अपने साथ हुए सलूक को लेकर मोहम्मद हनीफ का मलाल इस माफ़ी से कुछ कम तो हुआ होगा।
उस घटना के मुकाबले एक बहुत छोटी सी घटना १२ मई को दिल्ली के इन्द्रा गाँधी हवाईअड्डे पर भी हुई... यह घटना बहुत मामूली सी थी .... लेकिन बड़ी इस लिए हो गई क्योंकि एक दाढ़ी टोपी वाले एक मुसलमान ने केवल इतनी ग़लती कर दी कि उन सज्जन ने जहाज़ उड़ने से कुछ देर पहले अपने घर फोन करके यह बता दिया कि दस पंद्रह मिनट में जहाज़ उड़ने (टेक ऑफ करने) वाला है.... बस यही कहना उन के लिए अज़ाब बन गया .....
पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया और अगले 20 घंटे तक उनसे पूछताछ चली। वह विश्व स्तरीय मदरसे दारुल उलूम देवबंद के आलिम हैं। दाढ़ी, टोपी, मुसलमान और दीन का यह मेल उनके लिए ख़तरनाक बन गया। अगले दिन उन्हें बाकायदा गिरफ्तार कर लिया गया। हवालात में दो रातें बितानी पढ़ीं, उसके बाद उन्हें ज़मानत मिली। हालांकि मुकदमा अब भी उनपर चलता रहेगा− धारा 425 के तहत। यह धारा शरारतपूर्ण हरकतों के लिए लगाई जाती है।
अब यह बात बिलकुल सा
फ है कि जिन अफसरों ने मौलाना नूरुलहुदा को गिरफ्तार किया, वह अब अपनी ग़लती छुपाने के लिए ये केस लगा रहे हैं। यानी उन्होंने अपने काम को एक कानूनी शक्ल देने के लिए एक सीधे−सच्चे आदमी को मुकदमे में फंसा दिया। कायदे से उन्हें मौलाना साहब से माफी मांगनी चाहिए थी। वे नहीं मांगते हैं तो सरकार को उनके खिलाफ एक्शन लेना चाहिए और खुद माफी मांगनी चाहिए।
हालाँकि माफी से कुछ नहीं होता। लेकिन इतना तो होगा ही कि मजबूर आम आदमी को कुछ तसल्ली होगी कि सरकार को अपनी गलती का अहसास है। फिर यह भी संभव है कि माफी पलट कर शायद सरकारों को अपने अन्दर झाँकने और अपनी अंतरात्मा टटोलने पर मजबूर करे।

यामीन अंसारी

Saturday, May 1, 2010

देश भक्त कौन ... देश द्रोही कौन...?


नाम : माधुरी गुप्ता
काम : पाकिस्तान में भारतीय दूतावास के लिए काम करना
आरोप : विश्व की खतरनाक खुफिया एजंसी आई एस आई के लिए अपने ही देश की जासूसी की

नाम : रविंदर सिंह
काम : रा का अधिकारी
आरोप : अमरीकी खुफिया एजंसी सी आई ऐ के जासूसी की ... लेकिन भारत की पकड़ में आने से पहले ही लापता

नाम : सुखजिंदर सिंह
काम : नौ सेना अधिकारी
आरोप : एक रूसी महिला के साथ कथित सम्बन्ध की जाँच जारी ....

नाम : मनमोहन शर्मा
काम : चीन में भारतीय दूतावास में वरिष्ठ अधिकारी
आरोप : एक चीनी महिला के साथ सम्बन्ध के बाद भारत वापस बुला लिया गया.... शक था महिला चीनी मुखबिर

नाम : रवि नायर
काम : १९७५ बैच के रा अधिकारी
आरोप : २००७ में एक लड़की के साथ दोस्ती के बाद वापस बुलाया गया ... लड़की चीनी जासूसी एजंसी की मुखबिर

नाम : अताशे
काम : भारतीय नौ सेना में कार्यरत
आरोप : पाकिस्तान में विदेशी खुफिया एजंसियों से कथित तालमेल का आरोप


नाम : यशोदानंद सिंह
काम : रिटायर्ड सी आर पी एफ सब इंस्पेक्टर
आरोप : नक्सलियों को हथियार बेचने वाले गिरोह का सरगना

नाम : विनोद पासवान
काम : हवालदार सी आर पी एफ
आरोप : नक्सलियों को हथियार बेचे

नाम : दिनेश सिंह
काम : हवालदार सी आर पी एफ
आरोप : नक्सलियों को हथियार बेचे

नाम : बंशलाल
काम : उत्तर प्रदेश पुलिस
आरोप : नक्सलियों को हथियार बेचे

नाम : अखिलेश पाण्डेय
काम : उत्तर प्रदेश पुलिस
आरोप : नक्सलियों को हथियार बेचे

नाम : राम किरपाल सिंह
काम : उत्तर प्रदेश पुलिस
आरोप : नक्सलियों को हथियार बेचे

नाम : नत्थी राम
काम : मोरादाबाद पुलिस अकादमी
आरोप : नक्सलियों को हथियार बेचे

साध्वी ( आतंकवादी) प्रज्ञा सिंह ठाकुर .... कर्नल ( आतंकवादी ) पुरोहित .... मेजर ( आतंकवादी ) रमेश उपाध्याय .....................................

क्या किया जाये यह लिस्ट तो बढती ही जा रही है ..... लेकिन अजीब बात है कि इसमें एक नाम भी किसी मुसलमान का नहीं है ... हमें तो कुछ नेताओ के भाषणों से ... धर्म और देश के कुछ ठेकेदारों से ... मुसलमानों से देश भक्ति का सर्टिफिकेट मांगने वालों से और खुद देश पर मर मिटने का दम भरने वालों से यह पता था कि भारत के मुसलमान देश भक्त नहीं हैं ... वह भारत में रह कर देश के साथ गद्दारी करते है ... यहाँ तो सब हिन्दू ही हैं ... एक भी मुसलमान इन देश के गद्दारों की सूची में नहीं दिख रहा है ... क्यूँ भई ... देश भक्तों के दावे तो खोखले साबित हो रहे हैं...
देश के इन सपूतो से और कथित देश भक्तों से बस एक सवाल है ... के वह हकीकत से क्यूँ मुंह छुपाते हैं ... क्यूँ सच्चाई का सामना नहीं करते .... क्या देश के मुसलमानों पर बार बार देश द्रोही का आरोप लगा कर और उनसे देश भक्ति का प्रमाण पत्र मांग कर उन्हें रस्ते से भटकने का प्रयास नहीं है यह ....
यह साबित करने के लिए अभी और प्रमाणों की आवश्यकता होगी कि आतंकवादियों का ... देश द्रोहियों का ... गुंडे और बदमाशों का कोई मज़हब नहीं होता .... उन्हें केवल उनके काम से जानने कि हिम्मत पैदा कानी होगी न कि सम्प्रदायकता के चश्मे से .... तभी हम देश को तोड़ने वाली इन शक्तियों से लड़ सकेंगे और देश को एक रख सकेंगे...............!


यामीन


Saturday, March 13, 2010

... तो मुसलमानों को रिज़र्वेशन क्यूँ नहीं ?

आखिर हमारे मुल्क में रिज़र्वेशन देने का पैमाना क्या है ...? रिज़र्वेशन देते समय दावा तो शायद यही किया जाता है कि देश में जो कोई भी किसी भी मैदान में पिछड़ रहा है उसे तरक्की और देश की मुख्य धारा में लाने के लिए रिज़र्वेशन या आरक्षण का सहारा दिया जाए । कुछ हद तक दावा सच भी होता है ... क्यूँ कि जिन्हें अभी तक आरक्षण दिया गया है उन वर्गों को इसका कुछ न कुछ लाभ भी मिला है ....
अब बारी है महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण देने की... इस के लिए कौन सी पोलिटिकल पार्टी कितनी संजीदा है ... यह हम लगभग पिछले १५ वर्षों से खूब देख रहे हैं ....

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब किसी के पिछड़े पन को दूर करने और वर्ग विशेष को मुख्य धारा में लाने के लिए रिज़र्वेशन एक बड़ा हथियार है तो फिर तरक्की से कोसों दूर मुसलमानों को रिज़र्वेशन देने में तमाशा और दिखावा क्यूँ किया जा रहा है ....
यू पी सरकार ने जस्टिस सच्चर से ए छानबीन क्यूँ करवाई कि इस देश के मुसलमानों की स्थिति क्या है और वो इस देश में दुसरे दर्जे के शहरी क्यूँ हैं.... क्या इस लिए कि उन्हें अभी और कितना पिछड़ा बनाया जा सकता है

महिलाओं को रिज़र्वेशन दिया जा सकता है ... दलितों और आदिवासयों को आरक्षण दिया जा सकता है... तो फिर मुसलमानों के पिछड़े पन को दूर करने और उन्हें तरक्की की रफ़्तार में शामिल करने के लिए रिज़र्वेशन क्यूँ नहीं ... मुस्लमान आखिर कब तक इसी प्रकार राजनीती और धोका धडी का शिकार होते रहेंगे .... उन्हें केवल वोट बैंक समझने और इस्तेमाल करके फ़ेंक देने वाली चीज़ कब तक समझा जाता रहेगा...? जब जस्टिस सच्चर ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ साफ़ बता दिया कि इस देश के मुस्लमान दलितों और आदिवासियों से भी पिछड़े हुए है ... तो फिर इस पिछड़े पन को दूर करने के लिए मुसलमानों का हितैषी बताने वाली कांग्रेस नीत यू पी ए सरकार ने पिछले छे सात वर्षों में क्या किया है .... शायद उसके पास बताने के लिए कुछ नहीं निकलेगा ..... कांग्रेस ही क्यूँ ... दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ जो मुसलमानों का दम भर्ती हैं... उनके वोटों से अपनी सियासी दुकाने चला रही हैं .... बताने के लिए उनके पास भी कुछ नहीं होगा .....

अब समय आ गया है कि मुस्ली जनता, मुस्लिम राजनीतिज्ञ, मुस्लिम बुद्दिजीवी, मुस्लिम संस्थाएं और तंजीमें एकता के साथ .... अपने अपने हितों को एक तरफ रख कर आगे आयें और मुसलमानों को आरक्षण दिलाने के लिए आन्दोलन करें... मुहम चलायें .....

यामीन अंसारी
९०१५७५६९८८

ए बदायूं.. ए दयारे पाक.. ए शहरे क़दीम....