Tuesday, May 25, 2010

भारत सरकार माफ़ी क्यों नहीं मांगती ...?



लगभग दो ढाई साल पहले जब ऑस्ट्रेलिया में केवल आतंकवादी गतिविधि में शामिल होने के शक की बुनियाद पर बंगलौर के डाक्टर मुहम्मद हनीफ को गिरफ्तार किया गया था .... और उन्हें लगभग एक महीने तक जेल में रखा ,,,, परन्तु जब वह बे गुनाह साबित हो गए तो ऑस्ट्रेलिया की सरकार को अपनी ग़लती का एहसास हो गया तो सरकार ने अपने किये के लिए माफ़ी मांग ली थी .... यही नहीं उन्हें अपने यहां आकर काम करने का न्योता भी दिया। निश्चय ही ऑस्ट्रेलिया में अपने साथ हुए सलूक को लेकर मोहम्मद हनीफ का मलाल इस माफ़ी से कुछ कम तो हुआ होगा।
उस घटना के मुकाबले एक बहुत छोटी सी घटना १२ मई को दिल्ली के इन्द्रा गाँधी हवाईअड्डे पर भी हुई... यह घटना बहुत मामूली सी थी .... लेकिन बड़ी इस लिए हो गई क्योंकि एक दाढ़ी टोपी वाले एक मुसलमान ने केवल इतनी ग़लती कर दी कि उन सज्जन ने जहाज़ उड़ने से कुछ देर पहले अपने घर फोन करके यह बता दिया कि दस पंद्रह मिनट में जहाज़ उड़ने (टेक ऑफ करने) वाला है.... बस यही कहना उन के लिए अज़ाब बन गया .....
पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया और अगले 20 घंटे तक उनसे पूछताछ चली। वह विश्व स्तरीय मदरसे दारुल उलूम देवबंद के आलिम हैं। दाढ़ी, टोपी, मुसलमान और दीन का यह मेल उनके लिए ख़तरनाक बन गया। अगले दिन उन्हें बाकायदा गिरफ्तार कर लिया गया। हवालात में दो रातें बितानी पढ़ीं, उसके बाद उन्हें ज़मानत मिली। हालांकि मुकदमा अब भी उनपर चलता रहेगा− धारा 425 के तहत। यह धारा शरारतपूर्ण हरकतों के लिए लगाई जाती है।
अब यह बात बिलकुल सा
फ है कि जिन अफसरों ने मौलाना नूरुलहुदा को गिरफ्तार किया, वह अब अपनी ग़लती छुपाने के लिए ये केस लगा रहे हैं। यानी उन्होंने अपने काम को एक कानूनी शक्ल देने के लिए एक सीधे−सच्चे आदमी को मुकदमे में फंसा दिया। कायदे से उन्हें मौलाना साहब से माफी मांगनी चाहिए थी। वे नहीं मांगते हैं तो सरकार को उनके खिलाफ एक्शन लेना चाहिए और खुद माफी मांगनी चाहिए।
हालाँकि माफी से कुछ नहीं होता। लेकिन इतना तो होगा ही कि मजबूर आम आदमी को कुछ तसल्ली होगी कि सरकार को अपनी गलती का अहसास है। फिर यह भी संभव है कि माफी पलट कर शायद सरकारों को अपने अन्दर झाँकने और अपनी अंतरात्मा टटोलने पर मजबूर करे।

यामीन अंसारी

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